यजस्व वीर प्र विहि मनायतो भद्रं मनः कृणुष्व वृत्रतूर्ये ।
हविष्कृणुष्व सुभगो यथाससि ब्रह्मणस्पतेरव आ वृणीमहे।।
ऋ.२.२६.२
तर्जः पुन्नुम नूली पूमूत्त पोले पुन्युश-राग मधुवंती
आत्मन् तू है रणबाँकुरा युद्ध का बिगुल बजा ले (2)
वीर जननी की कोख से जन्मा, विजय शक्ति को बढ़ा ले
मारो, मारो, निज शत्रुओं को मित्रों को बल से बचा ले (2)
आत्मन्…
अपने सामर्थ्य को तू पहचान, कर वीरता के ही काम
बाह्य अंतः शत्रु करें आक्रमण उनके मिटा दे निशान
वृत्र संहार के, पाप पापियों के पापों का कर तू संहार
किन्तु बनाये रख भद्र स्वयं को, उनका व्यक्तित्व न मार
वो तेरे मित्र भी बन सकते हैं पाप से उनको बचा ले
हे आत्मन् गुण क्षमा के उपजा ले, अपने यजन को संभाले
आत्मन्…
हे आत्मन् पूजा कर परमात्मा की संगति कर सज्जनों की
दान के योग्य तेरे पास है जो, दे धन धान्य या रोटी
राष्ट्र समाज में अपनी हवि दे, कर आत्मोत्सर्ग व सेवा
सौभाग्यवान बने तेरी आत्मा निरभिमान होके देना
ऐ भाईयो आओ ब्रह्मणस्पति से पा लेवें रक्षण सारे
अभिनन्दनीय कार्यों को करके आत्मसंतोष कमा लें
आरो, आरो, आरारीरा, आरीरम आरीरम आरो (2)
आत्मन्…
(बाँकुरा) चतुर, (वृत्र) राक्षस (यजन) यज्ञ करना, (आत्मोत्सर्ग) आत्म त्याग।










