भक्ति
प्रेमी बनकर प्रेम में,
ईश्वर के गुण गाया कर।
मन-मन्दिर में गाफिला,
झाडू रोज लगाया कर।।1।।
प्रेमी बनकर प्रेम में ईश्वर……
सोने में तो रात गुजारी,
दिन भर करता पाप रहा।
इसी तरह बरबाद तू बंदे,
करता अपने आप रहा।।
प्रातः समय उठ नित्यप्रति
सत्संग में तू जाया कर।।2।।
प्रेमी बनकर प्रेम में, ईश्वर…..
नर तन के चोले का पाना,
बच्चों का कोई खेल नहीं।
जन्म-जन्म के शुभ कर्मों का,
होता जब तक मेल नहीं।
नर तन पाने के लिए
उत्तम कर्म कमाया कर।।3।।
प्रेमी बनकर प्रेम में, ईश्वर…..
दुखिया पास तेरे है कोई,
तूने मौज उड़ाई क्या?
भूखा-प्यासा रहा पड़ोसी,
तूने रोटी खाई क्या।
सबसे पहले पूछ कर,
भोजन को तू खाया कर।।4।।
प्रेमी बनकर प्रेम में, ईश्वर…….
देख दया उस परमेश्वर की,
वेदों का जिस ज्ञान दिया।
‘देश’ तू मन में सोच जरा तो,
कितना है कल्याण किया।
सब कर्मों को छोड़कर,
उसका नाम तू ध्याया कर। ।5।।
प्रेमी बनकर प्रेम में, ईश्वर…….










