ओ३म्। प्रातरग्निं प्रातरिन्द्रं हवामहे प्रातर्मित्रावरुणा प्रातरश्विना। प्रातर्भगं पूषणं ब्रह्मणस्पतिं प्रात: सोममुत रुद्रं हुवेम ।।१।।
हम प्रतिदिन प्रात:= प्रभात बेला में अग्निम्= स्वप्रकाशस्वरूप इन्द्रम्= परमैश्वर्य युक्त मित्रावरुणा= सर्वशक्तिमान् अश्विना= उस परमात्मा की हवामहे= स्तुति करते हैं और प्रात:= प्रभात वेला में भगम्= सेवनीय, ऐश्वर्य युक्त पूषणम्= पुष्टिकर्त्ता ब्रह्मणस्पतिम्= अपने उपासक, वेद और ब्रह्माण्ड के पालन करने हारे सोमम्= अन्तर्यामी प्रेरक उत= और रुद्रम्= पापियों को रुलाने हारे और सर्वरोगनाशक जगदीश्वर की हुवेम= स्तुति करते हैं।ओ३म्। प्रातर्जितं भगमुग्रं हुवेम वयं पुत्रमदितेर्यो विधर्ता। आध्रश्चिद्यं मन्यमानस्तुरश्चिद्राजा चिद्यं भगं भक्षीत्याह ।।२।।
अर्थ- प्रात:= ब्रह्म मुहूर्त में जितम्= जयशील भगम्= ऐश्वर्य के दाता उग्रम्= तेजस्वी अदिते:= समस्त ब्रह्माण्ड के पुत्रम्= रक्षक और य:= जो विधर्ता= उसको विविध प्रकार से धारण करने वाला है उसकी वयम्= हम हुवेम= स्तुति करते हैं। यम् चित्= जिसको आध्र:= सब ओर से धारणकर्त्ता मन्यमान:= जानने हारा तुरश्चित्= दुष्टों को दण्ड देने हारा और राजा= प्रकाश स्वरूप सबका स्वामी जानते हैं और यम् चित्= जिस भगम्= सेवनीय, ऐश्वर्ययुक्त ईश्वर का भक्षीति= इस प्रकार मैं सेवन करता हूँ, स्तुति करता हूँ, उसी का आह= उपदेश करता हूँ।
ओ३म्। भग प्रणेतर्भग सत्यराधो भगेमां धियमुदवा ददन्न:। भग प्रणो जनय गोभिरश्वैर्भग प्र नृभिर्नृवन्त: स्याम ।।३।।
अर्थ- हे भग= सेवनीय, ऐश्वर्ययुक्त प्रभो! प्रणेत:= आप सबके उत्पादक, सत्याचार में प्रेरक एवं सत्यराध:= सत्य धन अर्थात् मोक्ष रूप ऐश्वर्य को देने हारे हो। आप न:= हमारे इमाम् धियम्= इस बुद्धि को ददत्= दीजिए और उस बुद्धि के दान से हमारी उदव= रक्षा कीजिए। हे भग= ऐश्वर्ययुक्त प्रभो! न:= हमारे लिए गोभि:= गाय आदि और अश्वै:= घोड़े आदि उत्तम पशुओं के योग से राज्यश्री को प्रजनय= प्रकट कीजिए। भग= हे सेवनीय प्रभो! आपकी कृपा से हम लोग नृभि:= उत्तम मनुष्यों से तथा नृवन्त:= श्रेष्ठ वीर पुरुषों वाले प्रस्याम= होवें।
ओ३म्। उतेदानीं भगवन्त: स्यामोत प्रपित्व उत मध्ये अह्नाम्। उतोदिता मघवन्त्सूर्यस्य वयं देवानां सुमतौ स्याम ।।४।।
अर्थ- हे भगवन्! आपकी कृपा और अपने पुरुषार्थ से हम लोग इदानीम्= इस प्रभात वेला में उत= और अह्नाम्= दिनों के प्रपित्वे= उदयकाल में मध्ये= मध्य काल में भगवन्त:= सभी प्रकार के धन-ऐश्वर्य से सम्पन्न एवं शक्तिमान् स्याम= होवें। उत= और मघवन्= हे ऐश्वर्यों की वर्षा करने हारे प्रभो! सूर्यस्य उदिता= सूर्य के उदयकाल में वयम्= हम लोग देवानाम्= पूर्ण विद्वान्, धार्मिक, आप्त लोगों की सुमतौ= कल्याणकारी बुद्धि में अर्थात् उनके विचार को मानने वाले स्याम= होवें।
ओ३म्। भग एव भगवाँ अस्तु देवास्तेन वयं भगवन्त: स्याम। तं त्वा भग सर्व इज्जोहवीति स नो भग पुरएता भवेह ।।५।।
अर्थ- हे भग= सकल ऐश्वर्य सम्पन्न जगदीश्वर! जिससे तम् त्वा= उस आपकी सर्व:= सब सज्जन इज्जोहवीति= निश्चय करके प्रशंसा करते हैं स:= वे आप ही भग= ऐश्वर्य प्रदान करने वाले इह= इस संसार में तथा न:= हमारे गृहस्थाश्रम में पुरएता= अग्रगामी और हमें आगे-आगे सत्यकर्मों में बढ़ाने हारे भव= होइये। हे प्रभो! भग एव= सम्पूर्ण ऐश्वर्ययुक्त और समस्त ऐश्वर्य के दाता होने से आप ही हमारे भगवान्= पूजनीय देव अस्तु= हो जाइये। तेन= आपके कारण अर्थात् आपकी प्रार्थना और उपासना से देवा वयम्= हम विद्वान् लोग भगवन्त:= सकल ऐश्वर्य सम्पन्न होके सब संसार के उपकार में तन, मन और धन से प्रवृत्त स्याम= होवें










