प्रातः उठ के जो प्रभु गुण गायेगा

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अमर फल पायेगा (तर्ज-चली चली रे पतंग मेरी चली रे)

प्रातः उठ के जो प्रभु गुण गायेगा,
वो ही जग में अमर फल पायेगा,
चले आंधियां हजार टूटें
गमों के पहाड़,
कोई अपनी जगह से न हिलायेगा।
प्रातः उठके जो…….

दुःख दर्द सभी मिट जाएं,
पग चूमती रहें सफलताएं,
लिये मन में लगन हुआ धुन
उस प्रभु की शरण में
जो में मगन, में जो आएगा।
प्रातः उठके जो …….

यह दुनियां है किसने बनायी,
कोई कारीगर देवे न दिखाई,
इसे पालता है कौन
व सम्भालता है कौन,
सभी उलझनों का भेद खुल जाएगा।
प्रातः उठके जो……

तुम चाहो जो ‘पथिक’ सुख पाना,
कभी और किसी द्वार पे न जाना,
भरे प्रभु के भण्डार,
धुआं-धार लगातार,
चहुं ओर से आनन्द बरसाएगा।
प्रातः उठके जो ……..

उन्नति के लिये सेवा
और प्रेम चाहिए,
न कि आज्ञाएँ और आदेश।