प्राणपति मेरे प्राणों के पूजा तुम्हारी का इच्छुक

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प्राणपति मेरे प्राणों के पूजा तुम्हारी का इच्छुक

प्राणपति मेरे प्राणों के
पूजा तुम्हारी का इच्छुक
अपने सञ्जीवन से कर दो
जीवन मेरा उज्जीवित परिस्फुट
प्राणपति मेरे प्राणों के
पूजा तुम्हारी का इच्छुक

प्राण प्रबल हों स्वस्थ शरीर
अङ्ग-प्रत्यङ्ग में हो स्फूर्ती
कभी निठल्ला बैठा रहूँ ना
इन्द्रियों में दे दो प्रभूति
सब कुछ है, फिर भी क्यों जीवन
नीरस है रस से विच्युत
प्राणपति मेरे प्राणों के
पूजा तुम्हारी का इच्छुक

होता है अभिमान शक्ति पर
मधुरस में ऐंठन है कहाँ
मधुरस तो है प्रेम-प्रणति में
बसते हैं परमात्मा जहाँ
आनन्द पाते निर्-अभिमानी
होता प्रमुग्ध प्रेमी प्रस्फुट
प्राणपति मेरे प्राणों के
पूजा तुम्हारी का इच्छुक

स्थिररस तुम्हरी कृपाकोरों में
देता है लचकीला आनन्द
प्रेम झरित आकाश की गङ्गा
जिसमें व्याप्त हैं परमानन्द
हृदय-चकोर के मेरे चन्दा
स्नेह-रसों से करो प्रस्त्रुत
प्राणपति मेरे प्राणों के
पूजा तुम्हारी का इच्छुक

गूँध-गूँध कर स्नेह रसों में
प्रकृति को कर दिया परिपूर्ण
स्निग्ध तुम्हारी फैली किरणें
गतिमान हो रही हैं तूर्ण
समझा हूँ, निज ताप का कारण
हुआ न तुझसे मैं संस्तुत
प्राणपति मेरे प्राणों के
पूजा तुम्हारी का इच्छुक

दूर रहूँ ना तव संदृष्टि से
इन्द्रियाँ अर्चन-पुष्प बनें
पूजा के नेवैद्य हों प्राण
नए जीवन के तुष्ट बनें
पाऊँ लचक और मैं झुक जाऊँ
शरण दो आत्मा करो परिलुप्त
प्राणपति मेरे प्राणों के
पूजा तुम्हारी का इच्छुक

प्राणपति मेरे प्राणों के
पूजा तुम्हारी का इच्छुक

ओ३म् इन्द्रा॑येन्दो म॒रुत्व॑ते॒ पव॑स्व॒ मधु॑मत्तमः ।
अर्कस्य॒ योनि॑मा॒सद॑म् ॥
सामवेद 1076
ओ३म् इन्द्रा॑येन्दो म॒रुत्व॑ते॒ पव॑स्व॒ मधु॑मत्तमः ।
ऋ॒तस्य॒ योनि॑मा॒सद॑म् ॥
ऋग्वेद 9/64/22

रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई