प्राणों का क्या भरोसा, वे आयें या न आयें।
प्राणों का क्या भरोसा,
वे आयें या न आयें।
फिर क्यों जगत् के कर्ता
जगदीश को भुलाये।
प्राणों का क्या भरोसा,
वे आयें या न आयें………
घट-घट में रम रहा है,
सर्वत्र वह प्रभु है।
फिर दुष्ट कर्म करके,
कैसे उन्हें छुपायें।।
प्राणों का क्या भरोसा,
वे आयें या न आयें……….
देता है बल जो सबको,
संसार जिसको ध्याये।
छाया है जिसकी अमृत,
गुणगान उसके गायें….
प्राणों का क्या भरोसा,
वे आयें या न आयें…..
आए यदि मुसीवत,
दिल में यह जान लेना।
मिलती है हमको अपने,
दुष्कर्मों की सजायें….
प्राणों का क्या भरोसा,
वे आयें या न आयें……
सन्मार्ग पर चला दो,
अपनी झलक दिखा दो।
सब दूर कर दो भगवन,
गम की जो हैं घटायें…..
प्राणों का क्या भरोसा,
वे आयें या न आयें।…….










