सृष्टि तथा वेद की उत्पत्ति
(तर्ज- हे दयामय हम सबों को शुद्धताई दीजिये)
१. प्राकृतिक परमाणुओं की मूल सामग्री जुटी।
स्वयंभू परमात्मा ने तब सकल सृष्टि रची।
२. प्रकट पहले नभ हुआ फिर वायु अग्नि जल मही।
सूर्य चन्द्रादिक भुवन नक्षत्र ग्रह मण्डल सभी।
३. गरमी सरदी बन गई बरसात भी होने लगी।
बन गये तृण वृक्ष फल सब्ज़ी वनस्पति औषधी ।
४. फिर बनाये देहधारी जीव जन्तु अनगिनत ।
कारीगर की शेष थी कुछ और भी कारीगरी।
५. अन्त में परमात्मा ने इक नई रचना रची।
विश्व के सब प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ मनुष्य की।
६. इस तरह जब खूब जड़ चेतन खिलौने बन गये।
तब कहीं जाकर समष्टि रूप यह सृष्टि सजी।
७. सृष्टि के प्रारम्भ में फिर चार ऋषियों पर हुई।
जब दया दृष्टि विधाता सर्वशक्तिमान् की।
८. अग्नि वायु अंगिरा आदित्य के हृद्देश में।
ज्ञानदाता ने बहाई ज्ञान की गंगा नदी।
९. है अमर वाणी अलौकिक प्रेरणा उस ब्रह्म की।
परा पश्यन्ति बनी फिर मध्यमा और बैखरी।
१०. देवताओं में प्रथम संसार में ब्रह्मा हुए।
पढ़ के चारों वेद ब्रह्मा की अमर पदवी गही।
११. जगत् में गुरु शिष्य की सुपरम्परा चलती रहे।
‘पथिक’ वैदिक ज्ञान बगिया फूलती फलती रहे।










