प्रभु प्राप्ति का उपाय

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मूर्धानमस्य संसीव्याथर्वा हृदयं च यत्।

मस्तिष्कादूर्ध्वः प्रैरयत्पवमानोऽधि शीर्षतः ॥

यद्वा अथर्वणः शिरोदेव कोशः समुष्जितः ।

अथर्व. १०.२.२६ यत्प्राणो अभिरक्षति शिरो अन्न मथोमनः॥ अथर्व. १०.२.२७

तर्जः मधुरमी शुभयात्रयी

हृदय योग

संग कर शुभयोग से मन सुघड़! अन्तःकरण का
चिन्तन में यदि शोभा हो, मिले लाभ सही करण का
त्याग कर दे तू सर्वथा चञ्चलता का
और संशय छोड़ देना तू, निर्णिक्त निश्चय का
॥ मन सुघड़ ! ॥

अथर्वा, संशय विनाश

संशय जीवन में देता चोट, चलते जीवन को देता रोक
संशय से होती बहुत हानि, संशयालु न बनता निष्कामी
योग सफल हो जाता तभी, संशय विफल जब हो जाता।

पवमान/पवित्रता

साधक तू शौच पे रखना ध्यान, अन्दर बाहर के शौच को जान
स्नानादि बाहर की शुद्धि समझ, अन्दर की लोभ काम क्रोध व मद
अपनी सोच को रखना शौचवत्, रखना जीवन में सदा पवित्रता

मस्तिका दूर्ध्व मस्तिष्क से

आत्मा तो मन मस्तिष्क से पृथक दोनों का स्वामी संचालक
ब्रह्मरंध्र तक ले जाए प्राण, प्राण वृत्तियों का करे समाधान
देह इन्द्रिय मस्तिष्क से उपर, श्रेयस्कर स्वामी विजय का

प्रेरयत अधिशीर्षत शीर्ष से ऊपर प्रेरित

प्राण और प्राणवृत्तियों को साधो, मन की स्थिरता संयम को राखो
प्राणायाम से जब प्राण वृत्ति रुके, घबरायें नहीं, ना डर के झुकें
ऐसी दशा में है प्राण रक्षक, ध्यान हट जाता है सर्वथा विषय का॥

तत्प्राणो अभिरक्षति/प्राणों का रक्षक

योगाभ्यासी सदा ही रहे सावधान, रखे अन्न खानपान का भी ध्यान
खट्टा मीठा तीता उत्तेजक, सेवन ना करे रहे सदा संयमवान
ना हो माँसाहारी ना हो मदिराचारी, जैसा अन्न वैसा मन बने जीव का
अन्न मन प्राण विज्ञाननन्द कोश, इन पाँचों कोषों के विवेक को सोच
चतुर्कोषों का रक्षक है देव कोष, इसे साधते हैं सदा साधक लोग
ये आनन्द कोष करता प्रभुयोग, यही समय है अकत अमृत का मन सुघड़

(निर्णिक्त) शुद्ध किया हुआ। (श्रेयस्कर) मङ्गलकारी। (अकत) सम्पूर्ण। (सुबड़) प्रवीण,
कुशल, निपुण। (करण) कार्य।