प्रभुनाम के सिमरन को दिल से न जुदा करना।

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नित् ओ३म् जपा करना (तर्ज- बचपन की मोहब्बत को)

प्रभुनाम के सिमरन को
दिल से न जुदा करना।
मस्ती भरे हृदय से,
नित् ओ३म् जपा करना ।।

ब्रह्मचर्य की शक्ति ही,
जीवन को संवारेगी।
भगवान की भक्ति ही,
भव पार उतारेगी।।
दुःख दर्द भी सह करके
दुनिया का भला करना ।।१ ।।

देवत्व का गुण मन को
सर सब्ज बनाता हैं।
ईश्वर का भजन मन के,
संताप मिटाता है।।
नित संध्या हवन करके
पापों से बचा करना ।। २ ।।

दुर्भाव दुरित मन में
बेदार न हो जाए।
जीवन के सुनहरी दिन
बेकार न हो जाए ।।
दल-दल से गुनाहों की
नित दूर रहा करना ।।३।।

ओझल हो ना नजरों से
जो लक्ष्य है जीवन का।
मारग मिले मुक्ति का
और अन्त हो बन्धन का।।
अय भारती जीवन में
सुपथ पै चला करना ।।४।।

जिन्दगी महज इक खाम ख्याल-सी लगती है। प्यार से देखो तो, मुस्कान-सी लगती है। घबरा के देखो तो, वीरान-सी लगती है। उलझे ही रहो तो. तूफान-सी लगती है।