प्रभु को ध्याते रहे और कदम बढ़ाते रहे
प्रभु को ध्याते रहे और कदम बढ़ाते रहे,
कई मुसीबतें आईं वो मुस्कराते रहे।
गिरे हुए थे जमीं पर अछूत जो बनके,
उठा के उनको प्रेम से गले लगाते रहे।
बिछुड़ गए जो ईसाई या मुसलमां होके,
वो आर्य धर्म में फिर से उन्हें मिलाते रहे।
जहान वाले ऋषि को जहर पिलाते थे,
ऋषि तो वेद का अमृत पथिक पिलाते रहे।










