मूर्धा दि॒िवो नाभि॑िरा॒ग्निः पृथिव्या अर्घाभवद्ररती रोद॑स्योः ।
त्वं त्वां देवासौ ऽजनयन्त दे॒वं वैश्वानर॒ ज्योति॒रिदार्याय।
। ऋः १. ५६.२
तर्जः मैं तो इक ख्वाब हूँ
राग-विलासरवानी-तोड़ी
तू तो इक आर्य है वेदों से सदा प्यार तू कर
ज्ञान को पाके सदाचार से व्यवहार तू कर॥
मन की हलचल व चञ्चलता अशांत तुझको करे
ये दुराचार दिव्यता से तुझे दूर करे
गुण आर्यत्व के संयम से ही विस्तार तू कर
॥ तू तो॥
कर दुराचार का तू त्याग, कर सरल जीवन
तेरा वैराग्य दिलायेगा तुझे प्रभु प्रीतम
अपने जीवन में संस्कारों का प्रतिकार ना कर
॥तू तो॥
आर्य वैश्वानर अग्नि को प्रकट करते हैं
परम पुरुष को हृदय की गुहा में धरते हैं
आर्य, मन इन्द्रियों के संयम से, पा ईश्वर
॥तू तो॥
दिव्य ज्योति को ही निष्काम ज्ञानी पाते हैं
सर्वव्यापक है जो ईश्वर, उसे ही ध्याते हैं
तत्त्वज्ञानी महात्मा को मिलते वैश्वानर
॥तू तो॥
(गुहा) गुफा। (वैश्वानर) सर्व जन हितकारिन्। (आय) ज्ञानवान सदाचारी, थर्मात्मा को
आर्य कहते हैं जो परम ज्योति को प्राप्त कर सकता है। (तत्वज्ञानी) सत्य को जानने वाला।













