प्रभु कण-कण में वास करता है

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प्रभु कण-कण में वास करता है

तर्ज – यूँ ही तुम मुझसे……

प्रभु कण-कण में वास करता है,
जिसने जग बाग ये लगाया है।
प्यारे भगवन को जानते ही नहीं,
बागे खुश्ब में जो समाया है।

ऊँचे तरुवर ये पहाड़ के टीले,
प्यारे जगदीश के सहारे हैं
नीले सागर ये शांत सी झीलें,
उसके ही सब “सचिन” नज़ारे हैं
मेघा बरसाने वाला,
नदियाँ बहाने वाला,
जिसने इस सृष्टि को
प्रभु कण-कण में…… रचाया है

पंछी नगमें प्रभु के गाते हैं,
उसके दरबार में सवाली है
उसकी महिमा मधुर सुनाते हैं,
सारे जग बाग का वो वाली है
उसके जो गीत गाता,
अमर वो मोक्ष पाता साधु सन्तों
प्रभु कण-कण में…..
ने उसको ध्याया है

सबका मालिक वही विधाता है,
सारी सृष्टि उसी की माया है
साथ सुख दुःख में वो निभाता है,
गीत भंवरों ने उसका गाया है
सभी को भाने वाला,
बिगड़ी बनाने वाला सर्व सम्पन्न
प्रभु कण-कण में….. जिसे बताया है