प्रभो ! वेद-वीणा बजे विश्व भर में।
प्रभो ! वेद-वीणा बजे विश्व भर में।
सुनें मन्त्र झंकार प्रत्येक घर में।।
सभी राष्ट्र होवें स्वराज्याधिकारी।
बली निर्बलों को न जकड़ें स्वकर में ।।
उगे व्योम में ज्ञान का दिव्य भानू ।
खिलें पुण्य पंकज विमल मानसर में ।।
पताका उड़े ओम् की व्योम में फिर।
बहे विश्व स्वाधीनता की लहर में।।
अमर शान्ति का गान गूंजे गगन में।
सुधा-सी बरसने लगे सप्त स्वर में।।
यही कामना थी दयानन्द ऋषि की।
यही गूंज थी उनके प्रत्येक स्वर में।।










