फूलों से नित हँसना सीखो
फूलों से नित हँसना सीखो
भौरों से नित गाना
तरु की झुकी डालियों से नित
सीखो शीश झुकाना
सीख हवा के झोकों से लो
कोमल भाव बहाना
दूध तथा पानी से सीखो
मिलना और मिलाना
सूरज की किरणों से सीखो
जगना और जगाना
लता और पेड़ों से सीखो
सबको गले लगाना
मछ्ली से सीखो स्वदेश के लिए
तड़प कर मरना
पतझड़ के पेड़ों से सीखो
दु:ख में धीरज धरना
दीपक से सीखो
जितना हो सके अन्धेरा हरना
पृथ्वी से सीखो प्राणी की
सच्ची सेवा करना
जलधारा से सीखो आगे
जीवन पथ में बढ़ना
और धुएँ से सीखो हरदम
ऊँचे ही पर चढ़ना
रचनाकार :- श्रीनाथ सिंह जी
बचपन में उपर्युक्त रचना ही हम सब के लिए भजन होती थी | प्रस्तुत रचना में छोटे-छोटे उदाहरण देकर हमें इन सारे गुणों को अपनाने के लिए प्रेरित किया है और गुणों का ग्रहण और दोषों का नाश ही भजन का प्रथम सोपान है अतः इस रचना में ईश्वर के गुणों का स्मरण नहीं होते हुए भी यह गुण-ग्रहण और अवगुण-हरण के कारण भजन ही कहलाएगा | सादर – विश्वप्रिय वेदानुरागी
उपर्युक्त स्वर/लय में नीचे के पद को भी गया जा सकता है :–
वर्षा की बूँदों से सीखो,
सबसे प्रेम बढ़ाना
मेहँदी के पत्तों से सीखो
पिस पिस रंग चढ़ाना
मुर्गे की बोली से सीखो
प्रातः प्रभु गुण गाना
पानी की मछ्ली से सीखो
धर्म के हेतु मर जाना
वर्षा की बूँदों से सीखो,
सबसे प्रेम बढ़ाना










