पटियों और झूमर में।

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पटियों और झूमर में।

पटियों और झूमर में।
यह शीश-फूल सच्चा सिर का,
सिर झुके बड़ों के आदर में।।

पतिधर्म श्रवण हो श्रवणों से,
यह श्रवण-फूल अति उज्जवल हो।
माथे पर तेज की बेंदी हो,
आँखों में लाज का काजल हो।।

शुद्धता नाक की हो बुलाक,
दाँतों की चोष सफाई हो।
जम जाय जितेन्द्रियता का रंग
यह मालों की अरूणाई हो।।

बाजुओं का बाजूबन्द यही,
बाजुओं में बस तैयारियाँ हों।
अंगुली के मुंदरी और छल्ले
अनगिनत दस्तकारियाँहों ।।

जिन हाथों के प्यारे जेवर,
चक्की, चर्खा सिल-बटना हैं।
उनके आगे क्या चीज भला,
हथफूल छन्न और कंगना हैं।।

जो हाथ दास बनकर घर के,
घरके घर को रोटियाँ खिलाते हैं।
पहुँचियाँ, पछेली, दस्ताने,
उनके आगे शर्माते हैं ।।

कण्ठी तो यही कण्ठ की है,
बस कण्ठ में मिसरी घोली हो।
यह गले का सच्चा गुलूबन्द,
सच्ची और मीठी बोली हो।।

हो हृदय पै श्रद्धा का जुगनू,
जुड़वां हमेल गम्भीरता की।
सत्यता मोतियों की माला,
और चम्पाकली धीरता की।।

प्रति प्रेम का चन्दरसेनी हार
गर्दन पर और जिगर पर हो।
पतिव्रत और ब्रह्मचर्य व्रत की,
निर्मल कौंधनी कमर पर हो ।।

पति-आज्ञा में जम जाय पाँव,
यह लच्छे छड़े हैं पाँवों के।
सन्मार्ग पै चलते रहें पाँव
यह बिछुए कड़े हैं पाँवों के ।।

लज्जा की तथा शील की जब,
साड़ी और चोली शोभित हों।
तब देख-देख उस नारी को,
देवियाँ स्वर्ग की लज्जित हों।।

यह हैं नारी जाति के
भूषण और श्रृंगार।
होती है नित प्रकृति भी
जिन्हें देख बलिहार।।