परमेश्वर से प्रीत कर, मन अपने को जीत कर।

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परमेश्वर से प्रीत कर, मन अपने को जीत कर।

परमेश्वर से प्रीत कर,
मन अपने को जीत कर।
पर हित पर उपकार में,
जीवन को व्यतीत कर।
परमेश्वर से प्रीत कर, मन अपने……

इस दुनियाँ में सब से ऊँचा
मानव का तन पाया है।
जीने वाले सांस तुम्हारे,
जीवन का सरमाया है।
वक्त रहेगा बीत कर,
सोच समझ मनमीत कर।
परहित पर उपकार में जीवन……

तन को तो मजबूत बनाया,
मन क्यों मलिन तेरा है।
बाहर तूने दीप जलाए,
अन्दर घोर अन्धेरा है।
बातें न विपरीत कर,
मन को न भयभीत कर।
परहित पर उपकार में जीवन……….

जीवन है नदिया की धारा,
सुख-दुःख दो किनारे हैं
इसी के अन्दर आते जाते,
कितने जन्म गुजारे हैं।
वर्तमान संगीत कर,
सफल भविष्य अतीत कर।
परहित पर उपकार में जीवन…..

आलस व अज्ञान के कारण,
धर्म कर्म सब भूल गया।
धन-दौलत को सब कुछ समझा,
इस झूले पर झूल गया।
शुभ कर्म संगृहित कर,
मुक्ति ‘पथिक’ निर्णीत कर।
परहित पर उपकार में जीवन…….