परखो रे अपनी चदरिया

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परखो रे अपनी चदरिया

परखो रे अपनी चदरिया
परखो रे झूठ कपट छल
दम्भ द्वेष का लग ना जाये दाग

शुभ कर्मानुसार मिली है चादर
सुन्दर साफ फिर काहे को मैली
करता बांध के इस में परखो रे ।।१।।

दे दी है अनमोल चदरिया
उसकी दया महान उसके
बदले इस जग अन्दर कुछ
तो कर निर्माण परखो रे ।।२।।

चिन्तन के साबुन को मल
कर शीतल जल में डार संत
जनों के सत्संग से ले भवित
रस उपहार परखो रे ।।३॥

परम लक्ष है वही हमारा
परमानंद का द्वार जहाँ
सुरेन्द्र चिर अवधि तक नही
है दुःख की मार परखो रे ।।४।।