परमपिता ने नेह बढ़ाले

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परमपिता ने नेह बढ़ाले

परमपिता ने नेह बढ़ाले,
वो ही सच्चा मीत यहाँ।
मन मन्दिर में उसे बसाले,
करले सच्ची प्रीत यहाँ।।

१ मस्त हुआ दुनियाँ में तू इतना,
उस ईश्वर को भूल गया।
देख-देखकर दुनियादारी,
तू इतना क्यों फूल गया।।
एक अकेला ईश्वर अपना,
झूठी जग की रीत यहाँ…..

२. भौतिक साधन किए इकट्ठे,
जीवन सुखी बनाने को।
इनके बल बूते पर चाहता,
वश में कंरु जमाने को।।
केवल कोरा भ्रम यह तेरा,
कैसे होगी जीत यहाँ…..

३. भाई बन्धु और हिमाती,
साथ तेरे ना जाएगा।
मोह माया में फंसकर बन्दे,
फिर पीछे पछताएगा ।।
एक दिन मुँह मोड़ेंगे सारे,
समझे जिन्हें पुनीत यहाँ……

४. जीवन सुखी बनाना चाहो,
ईश्वर को मत भूलो तुम।
अंहकार को तजकर सारे,
पींग प्रेम की झूलो तुम ।।
जीने की बस यही कला है,
उसके गाले गीत यहाँ…..