परम पिता से प्रीत लगा

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परम पिता से प्रीत लगा

परम पिता से प्रीत लगा,
भवसागर मे पार हो जा।

चल रही विषयों की अंधेरी,
जोत बुझाई जिसने तेरी।
उससे अपना आप छुड़ा,
भवसागर से पार हो जा।।१।।

परमपिता से नाता जोड़,
बदियों को मन मेरे छोड़।
जीवन अपना सफल बना,
भवसागर से पार हो जा।।२।।

अन्दर है प्रीतम तेरा,
मन मंदिर में है डेरा।
ज्ञान की सच्ची जोत जगा,
भवसागर से पार होजा ।।३।।

सत्संग दे विच आया कर,
गुण ईश्वर के गाया कर।
जीवन वेद अनुसार बना,
भवसागर से पार हो जा।।४।।

कभी घमण्ड नहीं करना चाहिए
और न किसी के ऊपर हँसना चाहिए।
अभी तो हमारी जीवन-नैय्या समुद्र ही में है।
पता नहीं कब क्या हो जाए।