पापों के बन्धन से मुक्ति दो भगवन्

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पापों के बन्धन से मुक्ति दो भगवन्

पापों के बन्धन से मुक्ति दो भगवन्
हृदय-गाँठ खोला करो ना !
कट जाएँ पाश तो दर्शन हों तेरे,
प्रभु, कष्ट, दुख, क्लेश हरो ना !
पापों के बन्धन से मुक्ति दो भगवन्
हृदय-गाँठ खोला करो ना !

खुल जाएँ गाँठें कुटिलता की सब,
प्रभु, तुझको पाने की करें प्रार्थना जब।
‘वृजिन’ कर्म की करें पार ना हद,
ऋजु-मार्ग चाहें, कभी हम ना खोना,
ऋजु-मार्ग-पथिप्रज्ञ बनो ना !
पापों के बन्धन से मुक्ति दो भगवन्
हृदय-गाँठ खोला करो ना !

हर लो कुटिलता, दे दो सरलता,
सद्ज्ञान दे दो कि पाएँ सफलता।
तुम्हीं जानते हो ऋजु-पथ प्रबलता,
सत्पथ चलाकर रक्षा करो ना !
प्रभु, चाहें तुमको न खोना।
पापों के बन्धन से मुक्ति दो भगवन्
हृदय-गाँठ खोला करो ना !

खुल जाएँ गाँठें इक-इक हृदय की,
युक्ति विचारें अघ-दुख विलय की।
अनमोल जीवन के याज्ञिक समय की,
उत्तम, अधम, मध्यम पाश खोलो ना !
सन्तान की लाज रखो ना !
पापों के बन्धन से मुक्ति दो भगवन्
हृदय-गाँठ खोला करो ना !

कट जाएँ पाश तो दर्शन हों तेरे,
प्रभु, कष्ट, दुख, क्लेश हरो ना !

रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई
*रचना दिनाँक :– * २२.४.२०२२ ११.५० रात्रि

राग :- बिहाग
गायन समय रात्रि का द्वितीय प्रहर, ताल दादरा ६ मात्रा

शीर्षक :- गाँठ खोल
वैदिक भजन८९५ वां

*तर्ज :- *
0238-838

शब्दार्थ :-
हृदय-गांठ = हृदय में स्थित पाप की गांठ
पाश = बन्धन
कुटिलता = टेढ़ापन,
वृजिन = पाप
‌ऋजु = सरल, सच्चा, ईमानदार
पथिप्रज्ञ = राह दिखाने वाला
विलय = समाप्त, अंत

प्रस्तुत भजन से सम्बन्धित पूज्य श्री ललित साहनी जी का सन्देश :– 👇👇

गाँठ खोल

‘गांठ खोल’ऐसी याचना ना करके ‘ग्रंथिं न विष्य ग्रंथितम्’ [गांठ की भान्ति बंधे हुए को खोल] कहा है। बंधे को खुलवाने की प्रार्थना सीधी और साफ है। भविष्य में कई प्रकार के बंधन ग्रंथियां=पाश होते हैं। सभी खुलने चाहिए–‘उदुत्तमं मुमुग्धि नो वि पावन मध्यमंचृत’। अवाधमानि जीवसे।। ऋ॰१.२५.२१=हे भगवन्! हमारे उत्तम पास को खोल मध्यम को काट और जीने के लिए अधम पापों को भी काट। पाश तभी कटते हैं जब भगवान के दर्शन हो जाएं।
भिद्यते हृदय ग्रन्थिश्च्छिद्यन्ते सर्वसंशया।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्
दृष्टे परावरे।।
हृदय की गांठ खुल जाती है, संशय छिन्न- भिन्न हो जाते हैं, बंधनहेतु कर्म शिथिल पड़ जाते हैं, जब उस परावर के दर्शन होते हैं।
गांठ खुलने के साथ सुमार्गज्ञान भी चाहिए। इसलिए कहा–‘ऋजुं च गातुं वृजिनं च’=ऋजु और वृजिन मार्ग को भी खोल। दोनों का भेद बता, ताकि हम वृजिन छोड़कर ऋजु मार्ग पर चल सकें। भगवान को ऋजु मार्ग ही प्यारा है, जैसा कि अथर्ववेद [८/४/१२] में कहा है–तयोर्यत।सत्यंयतरवृजीयस्तवित्सोमो अवति हन्त्यासत्।।
उन दो में जो सत्य और जौन सा ऋजु होता है, भगवान उसकी रक्षा करता है और मिथ्या को सर्वथा मार देता है।
भगवान से प्रार्थना है कि जिस प्रकार घर- बार वाला मनुष्य शीघ्रता करता हुआ, चिल्लाता हुआ, अपनी संतान को बचाने के लिए दौड़ता है,प्रभु ! तू भी हमें वैसे ही बचा।
895 वां वैदिक भजन👏🏽🕉️