पंडित_गुरूदत्त_विद्यार्थी महर्षि दयानंद सरस्वती के पश्चात पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी आर्य समाज के प्रथम महापुरुष हुए हैं जिन्होंने अपने जीवन के अत्यल्प समय में महर्षि दयानंद द्वारा प्रारंभ किए गए कार्यों के प्रचार के लिए अपने जीवन की आहुति दी थी।
पंडित गुरुदत्त जी के बारे में बहुत कम लोग जानते थे हैं कि वह ब्राह्मण कुल में नहीं जन्मे थे। ब्राह्मणेतर कुल में जन्म लेकर पंडित जी की पदवी से विभूषित होने वाले वह प्रथम भारतीय थे।विद्यार्थी गुरुदत्त का जन्म अरोड़वंशी परिवार में हुआ था लेकिन गुण कर्म स्वभाव से वह ब्राह्मण बन गए।उनके पूर्वजों में एक राजा जगदीश ने देश धर्म की रक्षा के लिए अपना शीश दिया था। शीश देने के कारण उनके वंशज सिरदाना नाम से कहलाए बाद में यह सिडाना और सरदाना भी लिखने लगे।
गुरुदत्त जी का जन्म के समय इनका नाम मूला रखा गया था, तब कौन जानता था यह मूला किसी अन्य मूल का शिष्य बन कर उसकी दिखाई राह पर अपना सर्वस्व होम कर देगा। गुरुदत्त जी एक विलक्षण बुद्धि और मस्तिष्क के थे।पंजाब के प्रथम एमएससी होने का गौरव इन्हें प्राप्त है। यह भारत के प्रथम रसायन विज्ञान के प्रोफेसर थे,जिनकी पुस्तक #टर्मनोलोजी_ऑफ_वेदाज़’ #ऑक्सफोर्ड_यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम मे शामिल थी।यूँ तो गुरुदत्त जी 1880 में ही आर्य समाज में प्रविष्ट हो गए थे।

उन्होंने वेद के मर्म को समझने के लिए संस्कृत का अध्ययन आरंभ किया और एक दिन ऐसी योग्यता प्राप्त की कि धारा प्रवाह संस्कृत बोलने में सक्षम हो गए. आर्य समाज के सदस्य तो पहले ही थे, वेद को ईश्वरीय वाणी मानते थे।परंतु ईश्वर को भी मानते हुए भी कभी-कभी पश्चिमी साहित्य के गहन और विस्तृत अध्ययन के कारण संशय में पड़ जाया करते थे। ईश्वर में आपकी आस्था डोल जाती थी।परंतु जब अजमेर से ऋषि बलिदान का दृश्य देखकर लौटे तो उनका जीवन, चिंतन और व्यवहार बिल्कुल बदल गया। मृत्यु शैया पर महर्षि को ईश्वरेच्छा में प्रसन्न देखा तो आप पर इसका एक विचित्र प्रभाव पड़ा ।विष के कारण ऋषि का सारा शरीर छालों से छलनी हो चुका था किंतु ऋषि के मुख से फिर भी आह की वजाय प्रभु तेरी इच्छा पूर्ण हो, पूर्ण हो, पूर्ण हो… के शब्द सुनकर आपका ईश्वर पर विश्वास हो गया।ऐसा रंग चढ़ा जो फिर और अधिक गूढ़ होता चला गया।अजमेर से लौटकर गुरुदत्त जी ने संस्कृत प्रचार का आंदोलन चलाया।
श्रद्धा की ऐसी निर्मल धारा बहा दी कि बड़े-बड़े पदों पर आसीन आर्य पुरुष बगल में अष्टाध्यायी दवाए पंडित गुरुदत्त के घर को गुरुकुल बनाए बैठे रहते थे।उस युग का कोई बिरला नामी आर्य पुरुष होगा जिसने पं० गुरुदत्त से प्रेरणा पाकर थोड़ी बहुत संस्कृत ना पढ़ी हो।पंडित जी का जब व्याख्यान होता था तो श्रोता मंत्रमुग्ध होकर सुनते थे। वेद प्रचार की ऐसी लगन लगी की उन्हें अपनी सुध ही न रही।26वर्ष की अल्पायु में ही विद्यार्थी जी ने अद्भुत कार्य करके अपनी इहलीला का संवरण कर लिया।उनकी मृत्यु पर एक मुस्लम कवि ने लिखा था….
किसके मरने ने किया हमको हलाक।गम फजा है किसकी मरगे दर्दनाक।।नाम लेते हो फजूं होता है गम।जब्त गिराया हो नहीं सकता है कम।।
गुरुदत्त विद्यार्थी जी को शत् शत् नमन🙏










