पंछी रे पिंजरा हुआ पुराना
पंछी रे पिंजरा हुआ पुराना,
द्वार खुले उड़ जाना।
देख चुका सब मोह-माया,
जीवन धन सब आप लुटाया,
अब काहे पछताना।
पंछी रे……..
याद न कर तू गुजरी बातें,
न वो दिन है न वो रातें,
गुजरा तेरा जमाना।
पंछी रे……
फूल खिले कुम्हलाते भी हैं,
आने वाले जाते भी हैं,
जगत मुसाफिरखाना।
पंछी रे…….
जाको जैसो स्वभाव,
जायेगा न जी से।
नीम न मीठो होय,
चाहे सीचो गुड़, घी से ॥










