ओऽम् रस पगा पगा

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ओऽम् रस पगा पगा

ओऽम् रस पगा पगा,
सृष्टि का चप्पा चप्पा।
जो समझा उसे जग,
रस परिपूर्ण मिला। ।टेक ।।

ब्रह्म सर्वव्यापकता का,
क्या ही सूक्ष्म रूप है।
छाया ना कहो इसे,
ना ही ये धूप है।
अव्यक्त झीना झीना,
योगी को चीन्हा चीन्हा ।। १ ।।

तन मन आत्म मिला,
तभी तो जीव हुआ।
तन मन छूट गया,
जीव तो अतीव हुआ।
भ्रम का जाल कटा,
दिव्य आह्लाद मिला ।। २ ।।