ओ३म् नारायणः ओ३म् खं ब्रह्म ।

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ओ३म् नारायणः ओ३म् खं ब्रह्म ।

ओ३म् नारायणः, ओ३म् खं ब्रह्म ।
ईशावास्यमिदं सर्वम्… (२) ।। टेक ।।

सृष्टि यज्ञ सुरचना,
संधि संधि अर्चना।
समीपतम है हितकर,
ब्रह्म ज्योतित है घर ।।
अग्निम् ईळे पुरोहितम्,
यज्ञस्य देव मृत्विजम् ।
होतारं रत्नधातमम्,
ईशावास्यमिदं सर्वम् ।। १ ।।

ऊंचाइयों से उतरता,
ब्रह्मानन्द बह रहा।
पीले रे जीवात्मा,
ब्रह्म है निर्झर ।।

उच्चाते जातमन्थसो
दिविसद् भूम्यादधे ।
उग्रं शर्म महिश्रवः,
इन्द्राय पातवे सुतः ।। २ ।।

पवित्रता ते धारले,
आप्तों से मांज के।
अस्तित्वपूर्ण है चन्द्र,
ईशावास्यमिदं सर्वम् ।।

इशे पवस्व धारया,
मृज्जमानो मनीषिभिः ।
इन्दो रुचाभिः गाइहि,
इन्दो रुचाभिः गाइहि ।। ३॥

आत्मा है ब्रह्म में
तत्त्व है ब्रह्म में।
प्रज्ञान ब्रह्म में ब्रह्म
प्रणव स्वर है।।

अयमात्मा ब्रह्म,
असि त्वं तत्त्वम् ।
असि ब्रह्म प्रज्ञानम्,
तस्य वाचकः प्रणवः ।। ४ ।।

तैरता सा दौड़ता,
ब्रह्मानन्द बह रहा।
तैरता सा दौड़ता,
अस्तित्व है दौड़तर ।।

तरत् समन्दी धावति,
धारा सुतस्यान्धसः ।
तरत् समन्दी धावति,
ईशावास्यमिदं सर्वम् ।। ५।।

जग को है जो चला रहा,
अचलायमान है स्वयम् ।
दूर से दूर तक,
वही तो है निकटतम् ।।

लघु से लघुतम्,
महत् से महत्तम् ।
विस्तार है ब्रह्म,
ईशावास्यमिदं सर्वम् ।।

तदेजति तन्नैजति,
तद् दूरे तदु अन्तिके।
अणोरणीयानं,
महतो महीयानम् ।। ६ ।।

दूसरा न तीसरा
चौथा भी है नहीं।
पांचवा न छठा
सातवां भी है नहीं।
आठवां न नौवां
दशवां भी है नहीं।
ग्यारहवां न सौवां
करोड़वां भी है नहीं।।

द्वितीयो न तृतीयो
चतुर्थोपि न उच्यते ।
पंचमो न षष्ठो सप्तमोपि
न उच्यते ।
अष्टो न नवमो दशमोपि
न उच्यते ।।

प्रथमं हि प्रथमम्,
ब्रह्म हि प्रथमम् ।
पहला हि पहला,
ब्रह्म है पहला ।। ७ ।।