ओम् हम सब ब्रह्मचारी स्वप्न से बचते रहें।
ओम् हम सब ब्रह्मचारी,
स्वप्न से बचते रहें।
और मन को शुद्ध भावों,
से सदा भरते रहें ।।१।।
हे प्रभो! आनन्द दाता,
ज्ञान हमको दीजिए।
शीघ्र सारे दुर्गुर्णों को,
दूर हमसे कीजिए ।। ३ ।।
लीजिए हमको शरण में,
हम सदाचारी बनें ।
ब्रह्मचारी धर्म रक्षक,
वीर व्रतधारी बनें ।। ४ ।।
प्रेम की गंगा बहे,
दिल में हमारे रात दिन ।
तुमकों फिर भूले नहीं,
सद्ज्ञान ऐसा दीजिए ।। ५ ।।
गाढ़ निद्रा में निरन्तर,
कुछ समय सोते रहें ।
नित्य तज आलस्य उत्तम,
काल में जगते रहें ।। २ ।।










