ओम् भज ओम् रट ओम् हे सही।
ओम् भज ओम् रट ओम् हे सही।
ओम् के भजन बिना मुक्ति नहीं ॥
वेद उपवेद निराकार कहते हैं।
निर्लेप नारायण निर्विकार कहते हैं ।।
अजन्मा अखण्ड और अपार कहते हैं।
सर्वा अन्तर्यामी सर्वाधार कहते हैं ।।
हृदय में समाया और दूर ना कही।
ओम् भज ओम् रट ओम् है सही ॥
ओम् के भजन बिना मुक्ति नहीं ।
ओम् का प्रकाशरूप योगी कहते हैं ॥
देखकर समाधि में आनन्द रहते हैं।
प्रेम सुधा रस के जहाँ स्रोत बहते हैं ।॥
अन्न हद की धुनि मुनि गुनी लहते हैं।
ओम् भज ओम् रट ओम् है सही ॥
ओम् के भजन बिना मुक्ति नहीं।
ओम् की अपार माया देख तो भला ॥
हर दिशा में दिखती है उस ओम् की कला ।
रचना करि है पाँच तत्त्वों को मिला ।।
सूर्य, चन्द्रमा, तारागण दिए खिला।
चराचर में ज्योति जिसकी दमक रही ।।
ओम् भज ओम् रट ओम् है सही।
ओम् के भजन बिना मुक्ति नहीं ॥
काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार छोड़कर।
राग, द्वेष, अविद्या का जाल तोडकर ।।
वासना और तृष्णा का वेग मोड़कर।
धर्मरूप जिहाज पर हो सवार दौड़कर ॥
प्रभु दयाल मनुष्य पन का फल है यही।
ओम् भज ओम् रट ओम् है सही ॥
ओम् के भजन बिना मुक्ति नहीं ॥










