ओम् अनेक बार बोल प्रेम के प्रयोगी।
ओम् अनेक बार
बोल प्रेम के प्रयोगी।
है यही अनादि नाद
निर्विकल्प निर्विवाद ।
भूलते न पूज्यपाद,
वीतराग योगी ॥ ओम् ०
वेद को प्रमाण मान,
अर्थ-योजना बखान
गा रहे गुणी सुजान,
साधु स्वर्ग-भोगी। ओम्०
ध्यान में धरें विरक्त,
भाव से भजें सुभक्त ।
त्यागते अधर्म अशक्त
पोच पाप-रोगी ॥ ओम्०
‘शंकर’ अनादि नित्य नाम,
जो भजे विसार काम।
तो बने विवेकधाम,
मुक्ति क्यों न होगी ।।ओम्०










