निर्बल के प्राण पुकार रहे
निर्बल के प्राण पुकार रहे,
जगदीश हरे जगदीश हरे।
श्वासों के स्वर झंकार रहे,
जगदीश हरे जगदीश हरे ।।
आकाश हिमालय सागर में,
पृथ्वी पाताल चराचर में।
यह मधुर बोल गुञ्जार रहे,
जगदीश हरे जगदीश हरे ।।
जब दया दृष्टि हो जाती है,
सूखी खेती हरियाती है।
इस आशा पै जन उच्चार रहे,
जगदीश हरे जगदीश हरे ।।
सुख दुःख की चिन्ता है ही नहीं,
भय है विश्वास न जाय कहीं।
टूटे न लगा यह तार रहे
जगदीश हरे जगदीश हरे।
तुम हो करूणा के धाम सदा,
सेवक है राधेश्याम सदा ।
बस इतना सदा विचार रहे,
जगदीश हरे जगदीश हरे ।।










