नए वर्ष में नई-नई ले शुभ आशाएँ।
नए वर्ष में नई-नई ले शुभ आशाएँ।
आओ फिर एकता-स्नेह के दिए जलाएँ।।
आज जरूरत है सुन्दर-सुगठित समाज की,
खुशहाली फैलाने वाले राम-राज की।
उजड़ा-उपवन, बेसुधमाली भला बताओ-
कैसे होगी आस पूर्ण सुन्दर सु-राज की ?
रावण का चोला त्यागें अब
आओ खुद को राम बनाएँ।।
आओ फिर एकता-स्नेह के दिए………
अहंकार से नफरत से समाज टूटे हैं,
आतंकी-आलसी सदा पीछे छूटे हैं,
उनको अपने गले लगाओ जो रूठे हैं,
समझो इस समाज के दलित-सदा खूँटे हैं।
बैर भुला-सबको अपनाकर,
आओ अपनी शक्ति बढ़ाएँ।।
आओ फिर एकता-स्नेह के दिए………
सर्वे भवन्तु सुखिनः भाव हो नव वर्ष में,
राष्ट्र-प्रेम का सदा-चाव हो नए वर्ष में,
सभी फलें-फूलें, अपना तो यही है सपना-
विश्व में भारत का, प्रभाव हो नए वर्ष में।
रूप स्वाभिमानी बनकर,
हम फिर से विश्व के गुरु कहाएँ।।
आओ फिर एकता-स्नेह के दिए………..










