नारी सुरा सुत सम्पदा
नारी सुरा सुत सम्पदा,
इतना ही तू सच समझा।
इतना तू है अब तक भटका।
और तू भटकेगा रे कितना? ।। टेक ।।
जीवन अपना निरखले प्यारे,
सच कितना इसमें है समाया?
भूला भटका तू क्यों भटके
साथ है तेरे ब्रह्म का साया।
इस साए से अमृत झरता
फिर भी प्यासा तू है लगता ।।१।।
सुख दुःख इन्द्रिय भूल भुलैया,
दुनियां ये गहरी है तलैया।
नाव न बन तू नाव खिवैया,
साधन छोड़ रे पार उतरैया।
दिव्य आत्मधारी है तरता,
तरकर वो है ब्रह्म विचरता ।। २।।
प्रजातन्त्र का घातक घेरा,
हरपल हरक्षण मेरा मेरा
अज्ञानों का घिरता अन्धेरा,
रात सिलसिला नहीं सवेरा।
मम का ये सागर गहरा,
इससे तू है क्यों न उबरा ? ।। ३ ।।










