नहीं मै गाता हूं नहीं बहकाता हूँ। (धुन-खड़ी चौराहे पर)
नहीं मै गाता हूं नहीं बहकाता हूँ।
सोए शुभ संस्कार जगाता हूं
बार-बार।। टेक ।।
जन्म जन्मांतर के सारे
जो संचित कर्म हमारे।
हैं अन्तः करण पै अंकित
वह सब न्यारे न्यारे ।।
जिसे प्रोत्साहन मिलेगा,
कर्म फल वही फलेगा।
वैदिक सिद्धान्त सार
सुनाता हूँ बार-बार ।।1।।
लक्ष्य जीवन का सारा
कि दुख से हो छुटकारा ।।
दुख बन्धन का नाम है
बन्ध अज्ञान अधियारा।
ज्ञान बिन मुक्ति ना हो,
सफल कोई युक्ति ना हो।
अविद्या का अन्धकार
मिटाता हूँ बार-बार ।।2।।
जीव का यह देह धारण
कार्य के लिये कारण।
धर्मानुकूल आचरण से हो
दुखों को निवारण।
जैसा तुम कर्म करोगे
वैसा ही फल भुगतोगे।
जीवन की जीत हार
बताता हूँ बार-बार।।3।।
मोक्ष के चाहने वालो
पहले यह जन्म बनालो ।।
औरों को भी जीवन दो
स्वयं जीवन को संभालों ।।
जगत की इस कक्षा में
उर्तीण हो परीक्षा में।।
शोभाराम यह प्रचार
चाहता हूँ बार-बार।।4।।
अपने से निर्बल को सताना
पशुओ का व्यवहार यह माना,
बड़ों का आदर दया छोटो
पर और बराबर से हो दोस्ताना।
य. बन्धुत्व भाव जनता में
घर-घर अन्दर भर दो,
विश्व के सब नर नार एक
परिवार घोषणा कर दो।
आर्य वीरों अवसर है. ।।3।।
वाणी मात्र से भी पापी का
मान करो मत यह तरीका,
ऋषि दयानन्द ने बतलाया,
शोभाराम से हमने यह सीखा,
सत्यवादी धर्मात्मा निर्बल से
भी डरते रहो तुम,
नाश महा बलकारी पापी
का नित्य करते रहो तुम,
भारत वालों अवसर है
आज सुनहरा अपने देश को।
स्वर्ग समान बनाने का
बदलो ढंग जमाने का।।4।।
दवा ऐसी न हो कि मरीज
गायब हो जाये मिफाज़त
ऐसी न हो की हफीज़ गायब हो
जाये कदर दानी खूब बढ़े
मोहब्बत भी तारीफ ऐसी न हो
कि तमीज गायब हो जाये










