नगमें सुनाकर, तुम्हें क्या रिझायें।

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नगमें सुनाकर, तुम्हें क्या रिझायें।

तर्ज – ये दिल और उनकी

नगमें सुनाकर, तुम्हें क्या रिझायें।
ऋषियों के देश में भी, कटती है गाँय ।।

भला ना “सचिन” होगा,
माँ के हत्यारों जरा अपनी बुद्धि से,
कुछ तो विचारो घेरेंगी आके,
तुम्हें आपदायें ऋषियों

बाँधकर के पैरों को,
चलाते कटारी तड़फ-तड़फ गऊ माँ,
मरती बेचारी गऊओं को खाकर,
दिल बहलायें ऋषियों के देश…….

बड़े बेरहम दिल, हुये जा रहे हैं
बहुत खुश मिज़ाज़ी से,
गऊ खा रहे हैं लञ्जा ना इनको,
बिल्कुल भी आये ऋषियों के देश……

कई साल जीकर जो,
दूध पिलाती छाछ दही सबको,
मक्खन खिलाती उसकी ही गर्दन,
छुरी से उड़ायें ऋषियों के देश……