नगर में डगर में झौपड़ी चौबारों में।
नगर में डगर में झौपड़ी चौबारों में।
गाये जाओं गीत ऋषि के स्वरों
की झंकारों में।। टेक ।।
ऋषि के आने से
पहले हम अनजान थे।
अनेकों मतों में फसें
हुए हैरान थे।।
मानते थे ईश्वर को
पत्थरों दीवारों में।।1।।
वेद का प्रचार किया
दूर अन्धकार किया।
जहालत का जाल
तोड़ पोप गढ़ बिस्मार किया ।।
प्रचार किया घूम-घूम
गली व बाजारों में। ।2।।
दया के भण्डार थे वह
किसी से ना वैर था।
धन देकर विदा किया दिया
जिसने जहर था।।
गैर था न कोई ऋषि,
के विचारों में। ।3।।
विश्व के बचने का मार्ग
ऋर्षि की आवाज है।।
शोभाराम ‘प्रेमी’ कहे
आर्य समाज है।।
आज है जो लगा हुआ,
दुनिया के सुधारों में।।4।।










