नदिया आजा दौड़ कर
नदिया आजा दौड़ कर
नदिया आजा दौड़ कर
क्यों ना जलधि में जाके समाये
नदिया आजा दौड़कर
ऐ साधक ! तू भी कर ऐसी भक्ति
तप के प्रभाव से, कर यही युक्ति
सोमरस से क्यों ना बहाए
नदिया आजा दौड़कर
ज्ञान भजन स्वाध्याय की कलियाँ
झूमने लगेंगी हृदय की डालियाँ
उमङ्ग-उमाह बहाये
नदिया आजा दौड़कर
प्रभु-समर्पण की है नगरी
प्रभु हैं विराजे बन के अग्रणी
उस नगरी में बस जाएँ
नदिया आजा दौड़कर
ब्रह्म-पाकर ब्रह्म-रूप हो जाए
राग, द्वेष, मद स्वार्थ मिटाएँ
मन परहित में लगाएँ
नदिया आजा दौड़कर
ना बढ़कर परमेश! से कोई
बनें उसके मार्ग के बटोही
क्यों ना उसी में समाएँ
नदिया आजा दौड़ कर
नदिया आजा दौड़ कर










