न तो देर है न अन्धेर है

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न तो देर है न अन्धेर है

न तो देर है न अन्धेर है,
तेरे कर्मों का ये सब फेर है

लाखों तीरथ जाके नहा ले,
मिटते नहीं कभी कर्मों के काले
नेकी की मन में ज्योत जला ले,
और जीवन में कर ले उजाले
न तो देर है न अन्धेर है,
तेरे कर्मों का ये सब फेर है

नेकी जगत् में जो तू करेगा,
सर पे तेरे वो हाथ धरेगा
मुख से न कुछ भी कहना पड़ेगा
बिन माँगे प्रभु घर को भरेगा
न तो देर है न अन्धेर है,
तेरे कर्मों का ये सब फेर है

अपना कर्म ही सुख देता है
अपना कर्म ही दुःख देता है
कर्म बना, जीवन देता है
कर्म मिटा, जीवन देता है
हाँ!! देता है
न तो देर है न अन्धेर है,
तेरे कर्मों का ये सब फेर है

हमें ही “विजय” सुन चलना न आये
प्रभु तो सभी को चलना सिखाये
वो तो जरा भी ना तरसाये
हमको ही दिल से कहना न आये
न तो देर है न अन्धेर है,
तेरे कर्मों का ये सब फेर है

रचनाकार व स्वर : श्री विजय आनन्द जी