न मैं धाम-धरती, न धन चाहता हूँ
जपे नाम तेरा – सदा ऐसा दिल हो
सुने कीर्ति तेरी – वह श्रवण चाहता हूँ
विमल ज्ञानधारा से मस्तिष्क उभरे
वह श्रद्धा से भरपूर मन चाहता हूँ
न मैं धाम-धरती – न धन चाहता हूँ
कृपा का तेरी एक कण चाहता हूँ
नहीं चाहना है मुझे स्वर्ग-सुख की
मैं केवल तुम्हें प्राण-धन चाहता हूँ
उजाला हृदय में – अलौकिक हो तेरा
परम ज्योति प्रत्येक क्षण चाहता हूँ
न मैं धाम-धरती – न धन चाहता हूँ
कृपा का तेरी एक कण चाहता हूँ
रचनाकार :- पूज्य पण्डित श्री प्रकाशचन्द्र जी कविरत्न
उपर्युक्त स्वर/लय में नीचे के पद को भी गया जा सकता है :–
करें दिव्य-दर्शन तेरा जो निरन्तर
वही भाग्यशाली नयन चाहता हूँ










