न कोई साथी सखा सहेला
न कोई साथी सखा सहेला,
विजय के पथ पर चला अकेला
नदी के पानी का बनके रेला,
विजय के पथ पर चला अकेला ।।
प्रभु की धुन में अधीर बन कर,
निकल पड़ा था फकीर बन कर।
वह ब्रह्मचारी नया नवेला …. विजय ।।
पवित्र वेदों की शक्ति पाने,
आडम्बरों की जड़ें हिलाने।
वह बन गया विरजानन्द
का चेला …… विजय ।।
उधर विरोधी जहान सारा,
इधर अकेला प्रभु का प्यारा।
न पास पैसा न एक धेला…. विजय ।।
कदम-कदम पर बनावटें थीं,
विरोधियों की रुकावटें थी।
सभी तरफ था यही झमेला…विजय ।।
किसी ने उसको जहर पिलाया,
किसी ने तलवार से डराया ।
किसी ने मारा उठा के ढेला … विजय।।
सबर का दामन कभी न छोड़ा ,
न अपनी मंजिल से मुख ही मोड़ा ।
हजार संकट खुशी से झेला …. विजय ।।
पथिक-कपट छल को मात दे दी,
फंसे हुओं का निजात दे दी।
बड़ी कुशलता से खेल खेला …विजय ।।










