ना भूलो उस विधाता को
तर्ज – ना झटको जुल्फ़ से……..
ना भूलो उस विधाता को,
ये जिसने जग रचाया है।
कहीं झीलें, कहीं टीले,
कहीं पे जल बहाया है।
अरे नादान है कितना,
उसे तू जान ना पाया
बैठकर के सचिन “सारंग”,
ना उसका नाम ध्याया है ना भूलो……
नज़र आते सितारे जो,
उसी का नूर है इनमें उसी ने
तो अखण्ड सूरज, का दीपक
ये जलाया है ना भूलो……
उसी का नाम है पावन,
सभी का ख्याल रखता
वो उसी ने तो जहाँ रचकर,
हमें जीना सिखाया है ना भूलो……
पपीहा मोर कोयल भी,
उसी के गीत गाते हैं उसी
का साज़ भवरों ने,
मिलकर के बजाया है ना भूलो……










