मुद्दत हो गई जाग री जाती
मुद्दत हो गई जाग री जाती
नाश हुआ तेरा सोने में।।
तेरे सारे तन पर दीमक
लग रही भर गई गर्द बिछोने में।।
भोर भयी पक्षी वोले हैं
सूरज का प्रकाश हुआ
आलस्य को त्याग निर्भाग्य
जाग नींद में तेरा सत्यानास हुआ
तू घर को छोड़कर सोती रही
तेरे घर गैरों का वास हुआ
आराम गया सब द्रव्य लुटा
तेरा टुक नहीं चित्त उदास हुआ
नहीं मिले विश्राम तुम्हें अनमोल
समय के खोने में ।।1।।
तुझे जगाने की खातिर
बड़े-बड़े वीरों ने दुख ठाया
तिलक गोखले मोतीलाल
ऋषि दयानन्द ने समझाया
श्रद्धानन्द और दर्शनानन्द ने
ग्राम ग्राम चक्कर लाया
बिस्मिल शेखर यतेन्द्र वन्दा
भक्त ध्यान तेरे न आया
अनगिन जीवन तेरे लिये
गये विप्त की गठरी ढोने में।।2।।
उनकी जगाई नहीं जगी
धंसी अनगिनत आज बुराइयों में
औरों के संग मेल करें
छुरे कटारे भाइयों में
धर्म कर्म सत्य ध्यान ज्ञान बिन
जाती फंसी तवाइयों में
लिखा रही है नाम आज
तू मोहम्मदी और ईसाइयों में
कर्मवीरता त्याग छिपी
क्यों कायरता के कोने में।।3।।
यदि तुम्हें जिन्दा रहना तो
जीवन का प्रोग्राम बना
आगे बढ़ने ऊंचा उठने का
लक्ष्य सुबह और शाम बना
विष है मत विश्राम बना
इस जीवन को संग्राम बना
शिक्षा के सैक्शन तीन बना
जिन्दगी के चार मुकाम बना
शोभाराम बुजदिली त्याग
कुछ हाथ लगे नहीं रोने में।।4।।










