मेरे हृदय में अपना प्यार भर दो।
मेरे हृदय में अपना
प्यार भर दो।
दीनानाथ मेरी विनती
स्वीकार कर लो।।
तेरे भरे हैं भण्डारे
कोई कमी तो नहीं।
तीनों लोकां विच तेरे
जैसा दानी भी नहीं।
देके भक्ति का दान
माला माल कर दे दो।।१।।
दीनानाथ………
मैं भी माना कि
मैं गुनाहगार हूँ बड़ा।
कर विश्राम तेरे चरणों
में आ पड़ा।
सारे संकट प्रभु
मेरे दूर कर दो ।।२।।
दीनानाथ………
दात आया हूँ द्वारे
खाली मोडिये न।
मेरी जगता आस
प्रभु तोड़िये न।।
खाली झोली भरने
का इफरार कर दो ।।३।।
दीनानाथ………
मैनूं मान दिता बस
इक मान तूही है।
इक तूही है सहारा
प्रभु तू ही है।
मेरी बुद्धि में ज्ञान
दा भण्डार भर दे दो।।
दीनानाथ……..
जलती हुए लकड़ियाँ
अलग-अलग होने पर
धुआँ फेंकती हैं
और एक साथ होने पर
प्रज्वलित हो उठती हैं।
इसी प्रकार जाति बंधु
भी फूट होने पर दुःख उठाते
और एकता होने पर
सुखी रहते हैं।










