मसल रहे कलियों को

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मसल रहे कलियों को

मसल रहे कलियों को,
कांटे उगा रहे हैं राहों में।
कब तक जलती रहेंगी
अबला दहेज की इन ज्वालाओं में॥
कुल घातक दुश्मन जो समाज के
धन की ओर लपकते हैं।
जिधर भी देखो हर बेबस के
हर दिन नयन छलकते हैं।
ममता के मन्दिर के
आंगन में अंगार धधकते है।
खनकते हैं पायल के घुंघरु
किसी किसी के पाहों में॥1॥
कब तब जलती हरेंगी…..

आज की डोली कल की
अर्थी मंगलसूत्र सिसकता है।
चन्द चान्दी के सिक्कों में
हर धनी का बेटा बिकता है।
धन के बिना दूल्हा दंगई
घोड़े की तरह बिदकता है।
सविता सावित्री के सुहाग का
जले श्रृंगार चिताओं में॥2॥
कब तब जलती रहेंगी…..

जर जेवर मिलने पर ही
दुल्हन का रूप संवारते हैं।
जर जेवर ना मिले तो जहरी
फनियर से फुंकारते हैं॥
जहर फैल जाता नस-नस में
ऐसा डंक मारते हैं।
बांटते हैं दौलत बचने को
पुलिस के जा आकाओं में॥3॥
कब तक जलती रहेंगी ….

कल जिसकी शादी के
अन्दर स्वर गंजे शहनाई के।
टंगे शामयाने देखे
और सजे थे थाल मिठाई के॥
करी पिता ने विदा गले
चली मिलकर भाभी भाई के।
तबाही के दिन देखे कर्मठ
खुशियों की आशाओं में॥4॥
कब तक जलती रहेंगी….