मनवा ओ३म् नाम तू गाले।

0
22

मनवा ओ३म् नाम तू गाले।

मनवा ओ३म् नाम तू गाले।
सुमिरन कर ले परम पिता को।
मूरख अलख जगाऽ ऽले ।।

क्या जाने तू प्रभु की माया।
इस पल धूप तो इस पल छाया ।।
अवसर ऐसा फिर न मिलेगा।
जीवन सफल बनाऽऽले….।।

क्या देगी दुनिया इस रंगी।
क्यों देंगे ये साथी संगी।।
प्रभु नाम रस पी मतवाले ।।
प्रभु नाम फल पाऽऽले ।।

तन की क्षण भंगुर नौका पर।
परदेशी आया तू चढ़कर ।।
प्रभु नाम पतवार बना कर।
नौका पार लगाऽ ऽले ।।

अप्रार्थितानि दुःखानि यथेवायान्ति देहिनम् ।
सुखानि च तथा मन्ये दैन्यमत्रातिरिच्यते ।।

जैसे बिना मांगे दुःख मनुष्य को प्राप्त होता है. सुख भी उसी प्रकार उसके पास आता है। फिर सुख की प्रार्थना के लिए गिड़गिड़ाना व्यर्थ ही है।