माँगो क्या प्रभु प्यारे, दे दे जो देना चाहे

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माँगो क्या प्रभु प्यारे, दे दे जो देना चाहे


माँगो क्या प्रभु प्यारे !!!
दे दे जो देना चाहे
मुझसे तू पूछे काहे
दाता तो हो तुम प्यारे ऽऽऽऽऽऽ

जागी रे जागी रे तेरी सृष्टि जागी
शुभकर्मों की बन गई भागी
जागी रे जागी रे जागी रे
जागी रे जागी रे सर्वत्

माँगूँ क्या प्रभु प्यारे
तुमसे
सबके लिए तेरे दान हैं न्यारे
माँगूँ क्या प्रभु प्यारे ?

जागी रे जागी रे तेरी सृष्टि जागी
शुभकर्मों की बन गई भागी
जागी रे जागी रे जागी रे
जागी रे जागी रे सर्वत्

हे करुणाकर ! स्वयं क्या माँगूँ ?
जग में छलावा इत-उत भागूँ
ऽऽऽऽऽऽ
भागा फिरा मैं साँझ सकारे
माँगूँ क्या प्रभु प्यारे
तुमसे

महा-विद्वान् जो तुमसे चाहें
जिसके लिए तेरी टेर लगाएँ
ऽऽऽऽऽऽ
वो भी अधूरे हैं प्रभु सारे
माँगूँ क्या प्रभु प्यारे
तुमसे

दिव्य आनन्द श्रद्धा भक्ति दे
दिव्य प्रज्ञा या प्रकाश जगा दे
ऽऽऽऽऽऽ
माँगूँ क्यों ? विश्वास घना रे
माँगूँ क्या प्रभु प्यारे
तुमसे

समझो जिसमें कल्याण हो मेरा
दे दे खुद ही वह धन तेरा
ऽऽऽऽऽऽ
मैं तो हूँ केवल तेरे सहारे
माँगूँ क्या प्रभु प्यारे
तुमसे
सबके लिए तेरे दान हैं न्यारे
माँगूँ क्या प्रभु प्यारे ?

जागी रे जागी रे, तेरी सृष्टि जागी
शुभकर्मों की बन गई भागी
जागी रे जागी रे जागी रे
जागी रे जागी रे सर्वत्

रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई
*रचना दिनाँक :– *

राग :- मिश्र भैरव
गायन समय प्रातः ४:00 से ७:00, ताल कहरवा ८ मात्रा

शीर्षक :- जिसे तुम धन समझते हो,वही मुझे दे दो
वैदिक भजन ८७७ वां

*तर्ज :- *
0226-826

प्रस्तुत भजन से सम्बन्धित पूज्य श्री ललित साहनी जी का सन्देश :– 👇👇

जिसे तुम धन समझते हो,वही मुझे दे दो

हे दाता प्रभु! तुम कहते हो, कुछ मांगो।
पर मैं तुमसे क्या मांगू? मैं अबोध स्वयं क्या समझूं कि मेरे लिए क्या हितकर है। मुझे एक कहानी याद आ रही है। एक महात्मा ने किसी भक्त किसान की सेवा से प्रसन्न होकर उसे वर मांगने को कहा। उसने अपार धनी बनने की लालसा से यह वर मांग लिया कि मैं जिस वस्तु को स्पर्श करूं वह सोना बन जाए। जब घर पहुंचा तो पत्नी ने पूछा कि आज इतना परेशान क्यों लग रहे हो? प्रत्युत्तर में उसने पत्नी के कंधे पर हाथ रख कर कहा–अरी ! आज मैं संसार का सबसे अधिक धनी व्यक्ति बनने वाला हूं। पत्नी के कंधे पर उसके हाथ का ज्यों ही स्पर्श हुआ तत्काल वह सोने की मूर्ति में बदल गई। तभी उसकी छोटी बिटिया दौड़ी दौड़ी आई और उससे लिपट गई। तत्क्षण उसकी भी काया सोने की हो गई। तब तो किसान सिर पीट-पीटकर रोने लगा। दौड़ता दौड़ता महात्मा के पास पहुंचा और बोला भगवन्! यह वह वापस ले लो, मेरी पत्नी और बिटिया को जीवित कर दो। मुझे नहीं चाहिए सुवर्ण की दौलत। महात्मा बोले–बदले में कुछ और मांगो, बिना वरदान दिये अब वापस नहीं हो सकता। किसान ने कहा–मैं नहीं जानता, मुझे क्या मांगना चाहिए, एक बार धोखा खा चुका, अब कुछ ना मांगूंगा। आप स्वयं ही जिसमें मेरा कल्याण हो वह दे दो।
महात्मा ने कहा–तुझे पुरुषार्थ का मन्त्र देता हूं, मेहनत कर, तेरी बंजर भूमि सोना उगलने लगेगी।
वही गति, हे करुणाकर प्रभु! मेरी भी है। स्वयं मांगूंगा, तो संकट में पड़ूंगा। जो देना हो स्वयं ही दे दो। मैं तो नहीं जानता कि सच्चा धन क्या है? मुझे वह धन दे दो जिसकी बड़े से बड़े विद्वान लोग भी सराहना करते हों, जिस धन का नाम सुनकर वह भी झूम उठते हों। पर, नहीं मैं भूल करता हूं। विद्वानों का प्रमाण भी मैं क्यों धरूं। मैं तो पूर्ण तरह तुम्हें ही समर्पित होता हूं। हे ऐश्वर्यों के दानी जिसे तुम मेरे लिए ऐश्वर्य समझते हो, वही मुझे दे दो। दिव्य प्रकाश दे दो, दिव्य श्रद्धा दे दो, दिव्य प्रज्ञा दे दो, दिव्य पुरुषार्थ दे दो। नहीं, मैं फिर भटकने लगा। क्या दे दो, यह गिनाना तुम पर अविश्वास करना है। क्या तुम नहीं जानते किस-किस को क्या देना, है, क्यों देना है, किसके लिए देना है, कैसे देना है। फिर मैं क्यों मांगने लगा? तुम जिसमें मेरा कल्याण समझते हो, वह पूजित धन मुझे दे दो।
हे ईश! मैं नादान हूं।
तुम महान हो। सचमुच तुम महान हो।
🎧877वां वैदिक भजन🕉👏🏽