मानव देह में जीव को है
मानव देह में जीव को हैं
स्वतन्त्र अधिकार कर्म के,
सुख चाहे तो जीवन में
दस लक्षण धार धर्म के।
राज भी जाये तो भी हृदय
में धर्म धैर्य को धारों,
प्रतिकार के भावों से
क्षमा धर्म को मत मारो।
मन की वृत्तियों का निग्रह
कर संकट काट मर्म के ।।1।।
बिन आज्ञा के कहीं किसी
की वस्तु कभी उठाओ ना,
अन्दर बाहर की शुद्धि
करने में आलस्य लाओ ना।
इन्द्रियें न्यायपूर्वक वश कर
संयम नियम शर्म के।। 2 ।।
सब प्रकार बुद्धि को प्राप्त हो
बल जिससे आचरण करो।
विद्या की वृद्धि कर अंतः
करण का शुद्धि करण करो।
सत्य का ग्रहण असत्य त्याग
कर छेदन भेद भ्रम के।।3 ||
कोध रूपी राक्षस को मारो
वैर त्याग अहिंसा पालन।
प्रेमी धर्मात्मा बन कर तुम करो
धर्म का संचालन ।।
सत्य सनातन मार्ग निकट
पहुँचाये पूर्ण ब्रह्म के ।।4।।










