मनमीत प्रभु आना, तेरी ज्योत जगा जाना

0
17

मनमीत प्रभु आना, तेरी ज्योत जगा जाना

तर्ज : जब दीप जले आना

मनमीत प्रभु आना, तेरी ज्योत जगा जाना
प्रेम पतंगा बनकर चाहूँ तेरी ज्योत पे मंडराना ॥

मैं काम क्रोध विसारूँगा ना लोभ मोह से हारूँगा
संयम धीरज दे दो प्रभुजी नादान मैं अन्जाना ॥

मैं यज्ञमय भाव विचारूँगा अनमोल है जीवन तारूँगा
तेरे वेद ज्ञान के अमृत की इक बूंद पिला जाना ॥

सत्कर्म की राह निहारूँगा सुख दुःख में तुझे पुकारूँगा
तेरी महाशक्ति है हे दाता उद्धार करे जाना ॥

तेरा प्रेम हृदय में उतारूँगा मन को अपने मैं सँवारूँगा
तेरी प्रीत के आँचल में प्रभुजी मुझे आश्रय है पाना ॥

नित ओ३म् का जाप लगाऊँगा तेरे गीतों से आनन्द पाऊँगा
आत्मा परमात्मा सरस्वती का संगम है लाना ॥

अंतः नैनों से बुहारूँगा कह पिता पिता मैं पुकारूँगा
मन द्वार सजाकर बाट तकूँ मेरे प्रीतम आ जाना ॥

शम दम श्रद्धा को धारूँगा तन मन धन तुझपर वारूँगा
कैसे संभव तव कृपा बिना तेरे दर्शन पा जाना