मन रे ! मन रे ! शान्ति तेरी गई छली
मन रे ! मन रे !
शान्ति तेरी गई छली
वायु जैसे वश ना आए
तू है ऐसा धुनी
मन रे ! मन रे !
शान्ति तेरी गई छली
काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह के
शत्रु आ गए रक्षा कर
पाश बन्धें हैं पाँव में मेरे
इनसे से मेरी रक्षा कर
इन्द्रियाँ तेरे चलें इशारे
और किसी की ना सुनी
किसी की ना सुनी
किसी की ना सुनी
मन रे ! मन रे !
शान्ति तेरी गई छली
तू चाहे अगणित-शत्रु से
युद्ध अकेला जीत सके
तू चाहे पत्थर चमका दे
धारणा, ध्यान, समाधि पर
संयम बुद्धि करें प्रकाशित
मार्ग दिखा दे सही
दिखा दे सही,
दिखा दे सही
मन रे ! मन रे !
शान्ति तेरी गई छली
छोड़ दे हठ चञ्चलता त्याग दे
सुख किरणों की वर्षा कर
इन्द्र रूप धर योगी बन जा
और ईश्वर की संगत कर
है सामर्थ्य संकल्प अछूता
बन जा तू संयमी
तू संयमी,
तू संयमी
मन रे ! मन रे !
शान्ति तेरी गई छली
वायु जैसे वश ना आए
तू है ऐसा धुनी
मन रे ! मन रे !
शान्ति तेरी गई छली
रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई
*रचना दिनाँक :– *
राग :- सोहनी
गायन समय रात्रि का अंतिम प्रहर
ताल कहरवा ८ मात्रा
शीर्षक :- मन स्थिर कर
वैदिक भजन ८९४ वां
*तर्ज :- *
837-0238
शब्दार्थ :-
पाश = बन्धन
अछूता = अद्भुत
प्रस्तुत भजन से सम्बन्धित पूज्य श्री ललित साहनी जी का सन्देश :– 👇👇
मन स्थिर कर
मन बहुत चंचल है इस को वश में करना बहुत कठिन है गीता 6/34 में कहा
चंचलं हि मन: कृष्ण प्रभाथि बलवद् दृढ़म्।।
हे कृष्ण! मन बहुत चंचल है उधेड़बुन करने वाला बलवान तथा हठी है।
भाइयों को वश में करने के समान उसका निग्रह अत्यंत दुष्कर है कठिन है। चंचलता का दृश्य वेद ने दिखलाया है यज्जाग्रतो दूर मुदैति दैवं तदु सुप्तस्यदस्य तथैवैति[यजु३४/१]=जागते हुए का मन बहुत दूर चला जाता है वैसे ही सोए हुए का चला जाता है अर्थात ना सोते चैन और जागते कल ऐसा वह मन चंचल और विकल है। काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर अहंकार ईर्ष्या द्वेष आदि नाना शत्रु आत्मा पर प्रहार कर रहे हैं। आत्मा अकेला और उसके शत्रुओं की विशाल सेना ! कैसे पार पाएगा आत्मा? भी कहता है:-स्थिरं मन: चकृषे जात इन्द्र वेषीदेको युधये भूयसश्चित=हे इंद्र यदि तू मन को स्थिर कर सके तो तू अकेला ही बहुत उसे भी लड़ने को पर्याप्त है। मन के द्वारा युद्ध तो तभी हो सकता है जब मन किसी एक स्थान पर ठहरे अतः मन को स्थिर करो पुस्तक संसार के सभी ब्याह वालों के लिए मन की स्थिरता अपेक्षित होती है। मन की शक्ति के संबंध में वेद में कहा है:- ‘यस्मान ऋते किञ्चन कर्म क्रियते'(यजु ३४/३) जिसके बिना कोई भी कार्य नहीं किया जाता। आंख देखती है किंतु मन के सहयोग से कौन सुनता है मन के सहयोग से। जिस इंद्रियों के साथ मन का सहयोग ना हो वह कार्य नहीं कर सकती अतः ऐसे महाबली मन को ठहराना चाहिए। मन वश में हो जाए तो अज्ञान का पत्थर भी टूट जाता है-‘अश्मानं चिच्छवसा दिद्युत:’पत्थर को भी बल से चमका दूं। पत्थर चमक उठा तो पत्थर ही ना रहा। फिर मन वाला ज्ञान प्रति बंधकों को भी जान लेता है। धारणा ध्यान तथा समाधि के द्वारा मान्य ठहराया जा सकता है। धारणा ध्यान समाधि– इसको त्रिक संयम कहते हैं।
योग दर्शन में कहा–संयम के जीतने से बुद्धि में प्रकाश होता है। प्रकाश होने पर सभी रुकावटों का प्रत्यक्ष भान होने लगता है।
🎧894वां वैदिकभजन🕉️👏🏽










