मन पगले, प्रभु गुण गा।

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मन पगले, प्रभु गुण गा। (तर्ज:- मेरे मन की बीन बजा)

मन पगले, प्रभु गुण गा।
मन पगले, प्रभु गुण गा ।।
गुण गा, सुख पा,
मुक्ति-मार्ग पै जा। मन०

पता न जानूं, कैसे पाऊँ?
भक्ति बिना गुण कैसे गाऊँ?
कैसे उसमें मन रमाऊँ?
कोई यह दे समझा-मन पगले०

नहीं बताया जा सकता है,
उसका ठौर ठिकाना।
रंग लो मन को ‘पाल’ भक्ति से,
ईश्वर को गर पाना।।
प्रभु-प्रेम का रंग चढ़ा।
मन पगले, प्रभु-गुण गा।।