मन मीत बसा मन में

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मन मीत बसा मन में

मन मीत बसा मन में,
मन के दर्पण को देखा नहीं।
कभी निराकार माना
कभी साकार माना,
उलझे हैं उलझन में ॥

दिल के ही धड़कन में
दिलदार तेरा,
मन के ही दर्पण में है
यार तेरा।


सारंगी के तारों में,
स्वरों की झनकारों में,
बेमोल के गायन में-
मन मीत बसा।

बिटिया की शादी
कभी बेटे का गौना,
नित देखते हैं ये सपना सलौना।
सोना कहीं चांदी मिले,
रानी कहीं बांदी मिले,
रहना है माहलन में
मन मौत बसा।

गंगा व जमना में
गोते लगाए,
त्रिवेणी संगम में मल-
मल के नहाए।


कभी अमरनाथ पहुँचे,
कभी जगनाथ पहुँचे,
भटके हैं जीवन में-
मन मीत बसा।

रसना में रस कहीं
विषयों का पीकर,
सृष्टि पर दृष्टि नहीं डाली
कहीं पर।


यूं ही दिन जाते रहे,
जीवन गंवाते रहे,
यूँ बहुरूपियेपन में-
मनः मौत बसा।