मन मैला और तन को धोए
मन मैला और तन को धोए,
फूल को चाहे, काँटे बोये
मन मैला और तन को धोए
करे दिखावा भगति का क्यों
उजली ओढ़े चादरिया
भीतर से मन साफ किया ना,
बाहर माँजे गागरिया
परमेश्वर नित द्वार पे आया,
तू भोला रहा सोए
मन मैला और तन को धोए
कभी ना मन-मन्दिर में तूने
प्रेम की ज्योत जगाई
सुख पाने तू दर-दर भटके,
जनम हुआ दुखदायी
अब भी नाम सुमिर ले हरी का,
जनम वृथा क्यों खोए
मन मैला और तन को धोए
साँसों का अनमोल खजाना
दिन-दिन लूटता जाए
मोती लेने आया तट पे,
सीप से मन बहलाए
साँचा सुख तो वो ही पाए,
शरण प्रभु की होए
मन मैला और तन को धोए
फूल को चाहे, काँटे बोये
मन मैला और तन को धोए










