मन मधुर नाम भज ओम्-ओम्
मन मधुर नाम भज ओम्-ओम्
भज ओम्-ओम् भज ओम्-ओम्
अनुपम अनादि आनन्द खान,
ध्याते ऋषि-मुनि ज्ञानी सुजान ।
जिससे है जगमग ज्योतिमान,
तारागण अगणित सूर्य सोम।।
सूक्ष्मातिसूक्ष्म सबसे महान,
सर्वज्ञ सदा सद्गुण निधान
अणु-अणु कण-कण में विद्यमान,
व्यापक है ज्यों सर्वत्र व्योम।।
जिसके जप से हो बुद्धि विमल,
मिट जाये संशय शूल सकल ।।
आनन्द आन्तरिक से प्रतिपल,
पुलकित हो अतिशय रोम-रोम ।।
ब्रह्माण्ड रचे जिसने अनेक,
वह है प्रियतम प्राणेश एक।
भक्तों की रखता सदा टेक,
उस पर सहर्ष सर्वस्व होम ।।
हो हृदय ईश-विश्वास आस,
मत हो उदास नीरस निराश ।
तेरे सम्मुख होगा प्रकाश,
अति कुटिल क्रूर भी सरल मोम ।।










